अतिचालकता के मूल सिद्धांतों को समझाने वाला लेख जो लंदन समीकरण का उपयोग करता है। जानें कि अतिचालकता कैसे काम करती है एवं इसके पीछे के विज्ञान को समझें।
लंदन समीकरण | अतिचालकता के मूल सिद्धांतों की खोज
अतिचालकता भौतिक विज्ञान की एक महत्वपूर्ण शाखा है, जो विशेष परिस्थितियों में विद्युत प्रतिरोध के पूर्ण रूप से समाप्त हो जाने का अध्ययन करती है। इस क्षेत्र में प्रमुख योगदानकर्ता हैं लंदन भाई, फ्रिट्ज और हाइन्ज़ लंदन, जिन्होंने अतिचालकता के विश्लेषण और समझने के लिए 1935 में लंदन समीकरण प्रस्तुत किए। इस लेख में हम लंदन समीकरण और अतिचालकता के मूल सिद्धांतों की खोज पर चर्चा करेंगे।
लंदन समीकरण (London Equations)
लंदन समीकरण अतिचालक मैटेरियल्स में धाराओं और चुंबकीय क्षेत्रों के व्यवहार का वर्णन करते हैं। दो महत्वपूर्ण समीकरण हैं:
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यह समीकरण अतिचालकता की अवस्था में विद्युत धाराओं का वितरण बताता है:
\[ \frac{\partial \mathbf{j}}{\partial t} = \frac{n_s e^2}{m} \mathbf{E} \]
लंदन समीकरण के इस भाग में:- \(\mathbf{j}\) विद्युत धारा घनत्व है,
- \(n_s\) अतिचालक इलेक्ट्रॉनों की सांद्रता है,
- \(e\) इलेक्ट्रॉन का आवेश है,
- \(m\) इलेक्ट्रॉन का द्रव्यमान है, और
- \(\mathbf{E}\) विद्युत क्षेत्र है।
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दूसरा लंदन समीकरण चुंबकीय क्षेत्र और विद्युत धारा के अनुपात को दर्शाता है:
\[ \nabla \times \mathbf{j} = -\frac{n_s e^2}{m c} \mathbf{B} \]
इस समीकरण में:- \(\nabla \times \mathbf{j}\) धाराओं का रोटेशन है,
- \(\mathbf{B}\) चुंबकीय क्षेत्र है, और
- \(c\) प्रकाश की गति है।
अतिचालकता के मूल सिद्धांत
अतिचालकता के अवधारणा को समझने के लिए कई वैज्ञानिक प्रयोग और सिद्धांत महत्वपूर्ण हैं:
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हाइपरकंडक्टिविटी (Superconductivity): 1911 में हेइके कामरलिंग ओनेस ने पारा को 4.2 K पर ठंडा करके इसका विद्युत प्रतिरोध शून्य पाया। इसे अतिचालकता का पहला प्रकटिकरण माना जाता है।
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माइसनर प्रभाव (Meissner Effect): 1933 में वॉल्टर माइसनर और रॉबर्ट ओचनफेल्ड ने देखा कि अतिचालक अवस्था में पदार्थ चुंबकीय क्षेत्र को निष्कासित कर देता है। इस प्रभाव को माइसनर प्रभाव कहते हैं।
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बीसीएस सिद्धांत (BCS Theory): 1957 में जॉन बार्डीन, लियोनाथर कूपर, और जॉन रॉबर्ट स्क्रीफर ने बीसीएस सिद्धांत प्रस्तुत किया, जो इलेक्ट्रॉनों के जोड़े बनाने वाली क्वांटम मैकेनिकल प्रक्रियाओं को परिभाषित करता है।
इन सभी अवधारणाओं और समीकरणों ने अतिचालकता के समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, और इससे नई तकनीकों और अनुप्रयोगों का विकास संभव हो सका है।
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